चांदिया तहसील (म.प्र.) में अपवाह तंत्र का भू-आकृतिक अध्ययन
सपना सिंह1, अखिलेश चन्द्र सेठ2, रोहित चौरसिया3
1शोध-छात्रा, भूगोल विभाग, बयालसी पी. जी. कॉलेज, जलालपुर, जौनपुर, उत्तर प्रदेश, भारत ।
2असोसिएट प्रोफेसर, प्राचार्य, भूगोल विभाग, बयालसी पी. जी. कॉलेज, जलालपुर, जौनपुर, उत्तर प्रदेश, भारत ।
3शोधार्थी, भूगोल विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत ।
*Corresponding Author E-mail: abhisheksingh99627@gmail.com, rohitchaurasia8182@gmail.com
ABSTRACT:
चांदिया तहसील, मध्य प्रदेश के उमरिया जिले का एक महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है, जहाँ विविध स्थलाकृतियाँ एवं जल निकासी प्रतिरूप विद्यमान हैं। किसी भी क्षेत्र का अपवाह तंत्र उसकी भू-आकृतिक विशेषताओं, भूवैज्ञानिक संरचना तथा जलवायु परिस्थितियों का प्रतिफल होता है।12 प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य चांदिया तहसील के अपवाह तंत्र की प्रकृति, संरचना तथा उसके भू-आकृतिक प्रभावों का विश्लेषण करना है। अध्ययन में स्थलाकृतिक मानचित्रों, उपग्रह चित्रों तथा द्वितीयक आँकड़ों का उपयोग किया गया है। क्षेत्र में मुख्यतः डेंड्राइटिक तथा उप-डेंड्राइटिक अपवाह प्रतिरूप पाए जाते हैं2, जो समरूप चट्टानी संरचना एवं मध्यम ढाल का संकेत देते हैं। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अपवाह तंत्र ने क्षेत्र की अपरदन प्रक्रियाओं, घाटियों के निर्माण तथा भूमि उपयोग प्रतिरूप को प्रभावित किया है। जल संसाधन प्रबंधन, मृदा संरक्षण तथा सतत क्षेत्रीय विकास की दृष्टि से अपवाह तंत्र का यह अध्ययन महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।8
KEYWORDS: अपवाह तंत्र, भू-आकृति विज्ञान, चंदिया तहसील, वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप, जल ग्रहण क्षेत्र, अपरदन, नदी अपवाह क्षेत्र, सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS)।
प्रस्तावना:-
भू-आकृति विज्ञान पृथ्वी की सतह पर विद्यमान विभिन्न स्थलरूपों तथा उन्हें आकार देने वाली प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है।11 अपवाह तंत्र किसी क्षेत्र की नदियों, नालों एवं जलधाराओं का संगठित नेटवर्क होता है14, जो भू-आकृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी क्षेत्र की जल निकासी व्यवस्था वहाँ की स्थलाकृति, चट्टानी संरचना, ढाल, जलवायु एवं भूवैज्ञानिक इतिहास से प्रभावित होती है।1 चांदिया तहसील मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में स्थित है तथा यह क्षेत्र पठारी एवं नदीय भू-आकृतियों से युक्त है। यहाँ की प्रमुख जलधाराएँ वर्षा जल के निकास का माध्यम बनती हैं और स्थानीय भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती हैं।5 वर्तमान अध्ययन में चांदिया तहसील के अपवाह तंत्र की संरचना, प्रतिरूप तथा उससे उत्पन्न भू-आकृतिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। यह अध्ययन क्षेत्रीय जल संसाधन प्रबंधन एवं पर्यावरणीय नियोजन के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
अध्ययन क्षेत्रः
चांदिया तहसील मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है। यह क्षेत्र लगभग 23°30’ से 23°45’ उत्तरी अक्षांश तथा 80°45’ से 81°15’ पूर्वी देशांतर के मध्य विस्तृत है। क्षेत्र का भू-भाग मुख्यतः पठारी एवं हल्की पहाड़ी प्रकृति का है। यहाँ की औसत ऊँचाई लगभग 450-550 मीटर के मध्य पाई जाती है। चांदिया क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु विद्यमान है तथा वार्षिक वर्षा लगभग 1100-1300 मिमी होती है। क्षेत्र में मिश्रित वन, कृषि भूमि तथा खनिज संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता है। सोन नदी तंत्र की सहायक धाराएँ यहाँ की जल निकासी व्यवस्था का निर्माण करती हैं। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के कारण क्षेत्र में कृषि, खनन तथा परिवहन गतिविधियों का विकास हुआ है, जिसने भू-आकृतिक स्वरूप को प्रभावित किया है।4
शोध अध्ययन के उद्देश्यः
1. चांदिया तहसील के अपवाह तंत्र की संरचना एवं प्रतिरूप का अध्ययन करना।
2. अपवाह तंत्र एवं भू-आकृतिक विशेषताओं के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण करना।
3. अपवाह तंत्र के आधार पर क्षेत्रीय जल संसाधन एवं भूमि प्रबंधन की संभावनाओं का मूल्यांकन करना।
आँकड़ा स्रोत तथा शोध विधि तंत्रः
प्रस्तुत अध्ययन में प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आँकड़ों का उपयोग किया गया है। द्वितीयक आँकड़े भारत के सर्वेक्षण विभाग (SOI) के स्थलाकृतिक मानचित्रों, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्टों तथा जनगणना आँकड़ों से प्राप्त किए गए।10 उपग्रह चित्रों एवं GIS तकनीकों के माध्यम से अपवाह तंत्र का मानचित्रण एवं विश्लेषण किया गया।7 क्षेत्रीय अवलोकन द्वारा प्रमुख जलधाराओं एवं भू-आकृतिक विशेषताओं का सत्यापन किया गया। अपवाह प्रतिरूप, जल विभाजक एवं अपरदन प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन कर निष्कर्ष निकाले गए।6
परिणाम एवं परिचर्चाः
चांदिया तहसील का अपवाह तंत्र क्षेत्र की भू-आकृतिक संरचना, भूवैज्ञानिक विशेषताओं, स्थलाकृतिक दशाओं तथा जलवायु परिस्थितियों का प्रत्यक्ष परिणाम है।3 किसी भी क्षेत्र का अपवाह तंत्र केवल जल निकासी का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह भूमि आकृतियों के विकास, अपरदन एवं निक्षेपण प्रक्रियाओं, जल संसाधनों के वितरण तथा मानव गतिविधियों को भी प्रभावित करता है।9 चांदिया तहसील में विकसित जलधाराएँ क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यावरण एवं भू-आकृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यहाँ का अपवाह तंत्र मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर आधारित है तथा क्षेत्र की ढाल, चट्टानी संरचना एवं भूमि उपयोग प्रतिरूप से प्रभावित होता है। अध्ययन के दौरान प्राप्त तथ्यों के आधार पर क्षेत्र की प्रमुख भौगोलिक विशेषताओं एवं उनके अपवाह तंत्र पर प्रभाव का विवरण निम्न तालिका में प्रस्तुत किया गया है।
तालिका-1: चंदिया तहसील की भौगोलिक विशेषताएँ एवं अपवाह तंत्र पर उनका प्रभाव
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क्र. |
भौगोलिक घटक |
चंदिया तहसील की विशेषताएँ |
अपवाह तंत्र पर प्रभाव |
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1 |
स्थिति |
उमरिया जिला, मध्य प्रदेश, मध्य भारत में स्थित |
क्षेत्रीय अपवाह दिशा एवं जल-विभाजक सीमाओं का निर्धारण |
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2 |
भू-आकृति |
ऊँची-नीची भूमि, पठार, पहाड़ियाँ, घाटियाँ एवं मैदान |
अपवाह दिशा, जल प्रवाह तथा नदी बेसिन विकास को नियंत्रित करती है |
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3 |
ऊँचाई |
तहसील में ऊँचाई का मध्यम अंतर |
ढाल की तीव्रता एवं जल प्रवाह की गति को प्रभावित करता है |
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4 |
भूगर्भीय संरचना |
विंध्यन एवं गोंडवाना अवसादी शैल समूह |
अपवाह प्रतिरूप, नदी मार्ग एवं अपरदन दर को प्रभावित करती है |
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5 |
शैल प्रकार |
बलुआ पत्थर, शेल, चूना पत्थर तथा कोयला युक्त परतें |
अपवाह घनत्व एवं नदी जाल के विकास को निर्धारित करती हैं |
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6 |
जलवायु |
उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु |
वर्षा, सतही अपवाह एवं नदी प्रवाह को प्रभावित करती है |
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7 |
वर्षा |
मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान प्राप्त |
मौसमी नदी प्रवाह एवं भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देती है |
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8 |
मृदा प्रकार |
लाल मिट्टी, लैटराइट मिट्टी, जलोढ़ मिट्टी एवं वन मिट्टी |
जल अवशोषण, अपवाह एवं मृदा अपरदन को नियंत्रित करती है |
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9 |
वनस्पति आवरण |
सागौन, साल एवं बाँस युक्त शुष्क पर्णपाती वन |
अपवाह को कम करता है, मृदा संरक्षण करता है तथा नदी तटों को स्थिर बनाता है |
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10 |
सतही जल संसाधन |
मौसमी नाले एवं छोटी सहायक धाराएँ |
क्षेत्र के प्राथमिक अपवाह तंत्र का निर्माण करते हैं |
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11 |
भूजल स्थिति |
अपक्षयित एवं दरारयुक्त शैलों में मध्यम भूजल क्षमता |
शुष्क मौसम में आधार प्रवाह एवं जल उपलब्धता बनाए रखती है |
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12 |
कृषि |
मुख्यतः वर्षा आधारित कृषि |
भूमि उपयोग एवं सतही अपवाह प्रतिरूप को प्रभावित करती ह |
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13 |
खनन गतिविधियाँ |
कोयला एवं अन्य खनिजों का उत्खनन |
प्राकृतिक जलधाराओं में परिवर्तन एवं अवसाद भार में वृद्धि |
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14 |
बस्ती वितरण |
जल स्रोतों के समीप ग्रामीण बस्तियाँ |
निर्माण कार्य एवं भूमि उपयोग परिवर्तन द्वारा स्थानीय अपवाह को प्रभावित करती हैं |
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15 |
भूमि उपयोग प्रतिरूप |
कृषि भूमि, वन क्षेत्र, खनन क्षेत्र एवं आवासीय क्षेत्र जल |
ग्रहण क्षेत्र की जल-विज्ञान संबंधी दक्षता को प्रभावित करता है |
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16 |
अपवाह प्रतिरूप मुख्यतः |
वृक्षाकार एवं उप-वृक्षाकार |
समान शैल संरचना एवं कम संरचनात्मक नियंत्रण का संकेत देता है |
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17 |
अपरदन प्रक्रियाएँ |
मानसून के दौरान चादरी, नाली एवं गली अपरदन |
नदी चौनलों में अवसाद पहुँचाकर बेसिन आकृति को प्रभावित करती हैं |
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18 |
जल ग्रहण क्षेत्र की विशेषताएँ |
अनेक सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र जो बड़ी नदी प्रणालियों से जुड़े हैं |
जल संचयन, भंडारण एवं निकास प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं |
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19 |
पर्यावरणीय चुनौतियाँ |
वनों की कटाई, मृदा अपरदन एवं भूमि क्षरण |
अपवाह तंत्र की स्थिरता एवं जल ग्रहण क्षेत्र की सततता को प्रभावित करती हैं |
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20 |
भू-आकृतिक महत्त्व |
प्रवाही जल द्वारा निर्मित विविध स्थलाकृतियाँ |
अपवाह बेसिन एवं रूपमितीय अध्ययन हेतु उपयुक्त क्षेत्र प्रदान करती हैं |
स्रोतः भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) तथा क्षेत्रीय भू-आकृतिक अध्ययनों पर आधारित संकलन।
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि चांदिया तहसील का अपवाह तंत्र अनेक प्राकृतिक तथा मानवजनित कारकों से प्रभावित है। क्षेत्र की स्थलाकृति, भूगर्भीय संरचना, शैल प्रकार एवं ढाल जलधाराओं के विकास एवं दिशा निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।1 मानसूनी वर्षा अपवाह की मात्रा को नियंत्रित करती है जबकि वनस्पति आवरण एवं मृदा प्रकार सतही अपवाह एवं मृदा अपरदन को प्रभावित करते हैं। खनन गतिविधियाँ, कृषि विस्तार एवं भूमि उपयोग परिवर्तन प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था में परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। क्षेत्र में वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप की प्रधानता समरूप चट्टानी संरचना तथा अपेक्षाकृत कमजोर संरचनात्मक नियंत्रण को प्रदर्शित करती है।4
अपवाह तंत्र की सामान्य विशेषताएँः
चांदिया तहसील का अपवाह तंत्र मुख्यतः वर्षा-आधारित है तथा इसकी अधिकांश जलधाराएँ मानसून काल में सक्रिय रहती हैं।2 क्षेत्र में विकसित नदियाँ एवं नाले वर्षा जल को एकत्रित कर निम्न भागों की ओर प्रवाहित करते हैं। अधिकांश सहायक जलधाराएँ मौसमी प्रकृति की हैं, जबकि कुछ धाराओं में वर्ष भर सीमित प्रवाह बना रहता है। क्षेत्र की स्थलाकृति एवं ढाल के कारण जलधाराएँ स्वाभाविक रूप से विकसित हुई हैं और उन्होंने समय के साथ व्यापक नदी नेटवर्क का निर्माण किया है।15 यह नेटवर्क जल निकासी के साथ-साथ भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को भी नियंत्रित करता है।
अपवाह प्रतिरूप का स्वरूपः
अध्ययन से ज्ञात हुआ कि चांदिया तहसील में मुख्यतः वृक्षाकार (Dendritic) एवं उप-वृक्षाकार (Sub-dendritic) अपवाह प्रतिरूप विकसित हैं।4 वृक्षाकार प्रतिरूप में सहायक धाराएँ मुख्य नदी से वृक्ष की शाखाओं के समान जुड़ती हैं। ऐसा प्रतिरूप सामान्यतः उन क्षेत्रों में विकसित होता है जहाँ चट्टानों की संरचना अपेक्षाकृत समरूप होती है तथा संरचनात्मक नियंत्रण कम होता है।2 यह प्रतिरूप दर्शाता है कि क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना अपवाह विकास के लिए अनुकूल रही है। कुछ भागों में स्थानीय ढाल एवं शैल संरचना के प्रभाव से उप-वृक्षाकार प्रतिरूप भी विकसित हुआ है।
स्थलाकृति एवं ढाल का प्रभावः
चांदिया तहसील की स्थलाकृति विविधतापूर्ण है जिसमें पठार, पहाड़ियाँ, घाटियाँ एवं मैदान सम्मिलित हैं। उच्च क्षेत्रों से निम्न क्षेत्रों की ओर प्रवाहित जल ने अनेक जलधाराओं का निर्माण किया है। ढाल की तीव्रता जल प्रवाह की गति को प्रभावित करती है।12 जहाँ ढाल अधिक है वहाँ जल का वेग अधिक होने से अपरदन की तीव्रता बढ़ जाती है6, जबकि कम ढाल वाले क्षेत्रों में निक्षेपण प्रक्रियाएँ प्रमुख हो जाती हैं। परिणामस्वरूप क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की नदी घाटियाँ एवं अपरदनात्मक स्थलरूप विकसित हुए हैं।
भूवैज्ञानिक संरचना एवं शैल प्रकार का प्रभावः
चांदिया तहसील की भूगर्भीय संरचना मुख्यतः विंध्यन एवं गोंडवाना शैल समूहों से निर्मित है।10 बलुआ पत्थर, शेल तथा अन्य अवसादी चट्टानों की उपस्थिति ने जलधाराओं की दिशा एवं स्वरूप को प्रभावित किया है। कठोर शैलों वाले क्षेत्रों में नदी घाटियाँ अपेक्षाकृत संकरी एवं गहरी विकसित हुई हैं, जबकि कमजोर शैलों वाले क्षेत्रों में विस्तृत घाटियाँ पाई जाती हैं। शैलों की पारगम्यता एवं प्रतिरोधक क्षमता अपवाह घनत्व एवं जलधाराओं के विकास को नियंत्रित करती है।6 यही कारण है कि क्षेत्र में अपवाह तंत्र का स्वरूप स्थानानुसार भिन्न दिखाई देता है।
अपरदन एवं निक्षेपण प्रक्रियाएँः
अपवाह तंत्र भू-आकृतिक परिवर्तन का प्रमुख माध्यम है।5 मानसून के दौरान तीव्र जल प्रवाह के कारण चादरी अपरदन, नाली अपरदन तथा गली अपरदन जैसी प्रक्रियाएँ सक्रिय हो जाती हैं।7 अपरदित पदार्थ जलधाराओं के माध्यम से निम्न भागों तक पहुँचते हैं और वहाँ निक्षेपित होते हैं। इस प्रक्रिया से नदी तटों एवं घाटियों में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी का निर्माण होता है।5 अपरदन एवं निक्षेपण की संयुक्त क्रिया क्षेत्र की स्थलाकृति को निरंतर परिवर्तित करती रहती है तथा नदी बेसिन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है।13
जल ग्रहण क्षेत्र एवं जल संसाधनः
अध्ययन क्षेत्र में अनेक सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र विकसित हुए हैं जो बड़े नदी तंत्रों से जुड़े हुए हैं।14 ये जल ग्रहण क्षेत्र वर्षा जल के संचयन, संरक्षण एवं निकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्षेत्र में उपलब्ध भूजल संसाधन मुख्यतः अपक्षयित एवं दरारयुक्त शैलों से संबंधित हैं। मानसून के दौरान होने वाला भूजल पुनर्भरण जल उपलब्धता को बनाए रखने में सहायक होता है।10 जल ग्रहण क्षेत्रों का वैज्ञानिक प्रबंधन जल संरक्षण, सिंचाई विकास एवं सतत संसाधन उपयोग के लिए आवश्यक है।
भूमि उपयोग, कृषि एवं मानव प्रभावः
चांदिया तहसील में भूमि उपयोग प्रतिरूप मुख्यतः कृषि, वन, खनन तथा आवासीय क्षेत्रों में विभाजित है।8 नदी घाटियों एवं समतल क्षेत्रों में कृषि गतिविधियाँ अधिक विकसित हैं। कृषि भूमि से उत्पन्न सतही अपवाह स्थानीय जलधाराओं को प्रभावित करता है। क्षेत्र में कोयला खनन एवं अन्य खनिज उत्खनन गतिविधियों के कारण प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था में परिवर्तन देखा गया है।10 इसके अतिरिक्त सड़क निर्माण, बस्ती विस्तार एवं भूमि उपयोग परिवर्तन भी अपवाह तंत्र की प्राकृतिक संरचना को प्रभावित कर रहे हैं।
पर्यावरणीय समस्याएँ एवं संरक्षण की आवश्यकताः
क्षेत्र में वनों की कटाई, मृदा अपरदन, भूमि क्षरण एवं अनियोजित खनन गतिविधियाँ अपवाह तंत्र की स्थिरता के लिए चुनौती प्रस्तुत करती हैं।14 वनस्पति आवरण में कमी से सतही अपवाह बढ़ता है तथा मृदा संरक्षण की क्षमता घटती है।15 परिणामस्वरूप नदी चौनलों में अवसाद की मात्रा बढ़ जाती है और जलधाराओं की वहन क्षमता प्रभावित होती है। इन समस्याओं के समाधान हेतु जल ग्रहण क्षेत्र विकास, वनीकरण, मृदा संरक्षण उपायों तथा वैज्ञानिक भूमि उपयोग नियोजन को बढ़ावा देना आवश्यक है।8
भू-आकृतिक महत्त्वः
चांदिया तहसील का अपवाह तंत्र भू-आकृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रवाही जल द्वारा निर्मित घाटियाँ, अपरदनात्मक स्थलरूप, जलोढ़ मैदान तथा विभिन्न नदीय आकृतियाँ क्षेत्र के भू-आकृतिक विकास को प्रदर्शित करती हैं।6 अपवाह तंत्र के अध्ययन से क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना, स्थलाकृतिक विकास, अपरदन प्रक्रियाओं तथा जल संसाधनों की स्थिति को समझने में सहायता मिलती है। इसलिए चांदिया तहसील रूपमितीय (Morphometric) एवं अपवाह तंत्र संबंधी अध्ययनों के लिए एक उपयुक्त क्षेत्र प्रस्तुत करती है।9
निष्कर्षः
चांदिया तहसील का अपवाह तंत्र क्षेत्र की भू-आकृतिक संरचना एवं भूवैज्ञानिक विशेषताओं से गहराई से प्रभावित है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि क्षेत्र में डेंड्राइटिक एवं उप-डेंड्राइटिक अपवाह प्रतिरूप प्रमुख रूप से विकसित हैं।4 स्थलाकृति, ढाल एवं चट्टानी संरचना जलधाराओं की दिशा एवं स्वरूप को नियंत्रित करती हैं।1 अपवाह तंत्र ने अपरदन, निक्षेपण, घाटी निर्माण एवं भूमि उपयोग प्रतिरूपों को प्रभावित किया है। जल ग्रहण क्षेत्रों का उचित प्रबंधन जल संरक्षण एवं सतत विकास के लिए आवश्यक है।8 GIS एवं सुदूर संवेदन तकनीकों का उपयोग भविष्य में अधिक सटीक जल संसाधन नियोजन में सहायक सिद्ध हो सकता है।9 अतः चांदिया तहसील के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन हेतु अपवाह तंत्र का वैज्ञानिक अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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Received on 26.06.2026 Revised on 17.07.2026 Accepted on 05.08.2026 Published on 17.08.2026 Available online from August 22, 2026 Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(3):173-176. DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00031 ©A and V Publications All right reserved
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